जीवन में आत्म कल्याण के मार्ग में त्याग ही अति उत्तम है, इसे धारण कर माेक्ष काे पाते हैं
उत्तम त्याग का तात्पर्य परिग्रह रहित होना है। त्याग की भी अलग-अलग परिभाषा हैं। कहीं-कहीं हम बड़ी-बड़ी वस्तु का त्याग अल्प समय के लिए व आजीवन के लिए करते हैं। हर दिन हम कुछ छोटे-छोटे नियम थोड़े समय के लिए लेते हैं। त्याग और नियम छोटा हो या बड़ा हो। त्याग अमूक समय तक हो या जीवन पर्यंत का। जब कर्मों के बंध होते हैं तब त्याग के साथ भावनाएं और विचारधारा अच्छी होती है। यह बातें रविवार को अभिषेक जैन ने 8वां धर्म उत्तम त्याग पर विचार व्यक्त करते हुए कहीं। उन्हाेंने कहा शुभ कर्म और सुगति का बंध होता है। जीवन में आत्म कल्याण के मार्ग में त्याग ही अति उत्तम है। ऐसे संयमी भव्य जीव त्याग धर्म को धारण कर मोक्ष को पाते हैं। संसार में कोई भी व्यक्ति तब तक सुखी नहीं हो सकता। जब तक उसको किसी भी चीज की आकुलता है और आकुलता तब तक नष्ट नहीं हो सकती जब तक उसके पास कुछ भी परिग्रह है। पूर्ण परिग्रह का त्याग ही दिगंबर मुनिचर्या का आधार है। दिगंबर मुनिराज किसी भी बाह्य वस्तु का आलंबन नहीं लेते। सुई बराबर भी परिग्रह उनके साथ नहीं होता है। इसलिए वह नग्न होते हैं। गृहस्थ जीवन में यह त्याग गुरुओं ने दान के रूप में बताया है। जैन जन इस दिन क्या भावना करते हैं। उसको कवि ने इस प्रकार व्यक्त किया है। दान चार प्रकार का होता है और उसके पात्र भी चार तरह के होते हैं। औषधि दान, शास्त्र दान या ज्ञान दान, अभयदान और आहरदान। इससे पहले सुबह मंदिर में श्रीजी का अभिषेक, शांतिधारा, पूजन किया गया। शांतिधारा करने का लाभ नीलेश जैन ने लिया। मालूम हाे, दिगंबर जैन समाज के पर्युषण पर्व के तहत कॉलेज रोड स्थित जैन मंदिर में राेज कार्यक्रम हो रहे हैं।
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